Sunday, June 23, 2024
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पश्चिम से पूर्व तक राजनीति के केंद्र में रहा है गन्ना उद्योग

पश्चिम से लेकर पूरब तक गन्ना राजनीति के केंद्र में रहा है। समय से भुगतान, बकाये पर ब्याज, गन्ना मूल्य और चीनी मिलों की मनमानी से उपजी नाराजगी का असर गन्ना बेल्ट की राजनीति पर साफ दिखता है। गन्ना किसान राजनीति का बड़ा मुद्दा रहा है। पश्चिम से लेकर पूरब तक गन्ना राजनीति के केंद्र में रहा है। समय से भुगतान, बकाये पर ब्याज, गन्ना मूल्य और चीनी मिलों की मनमानी से उपजी नाराजगी का असर गन्ना बेल्ट की राजनीति पर साफ दिखता है। पिछले छह सालों में गन्ने से लेकर चीनी उत्पादन तक को पारदर्शी बनाने के लिए उठाए गए कदमों ने यहां की राजनीति पर भी असर डाला। किसानों को मेहनत का सही दाम मिले और चीनी मिलें भी फायदे में चलें, इसे ध्यान में रखकर कई फैसले लिए गए। एथेनॉल इंडस्ट्री ने तो गन्ना किसानों और चीनी मिलों के लिए ‘टॉनिक’ का काम किया है। एथेनॉल से मिलों का मुनाफा बढ़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि किसानों को जल्द भुगतान होने लगा। इस बीच किसानों की मांग पर २० रुपये रेट बढ़ाए गए। मुनाफा बढ़ने की वजह से ही गन्ने का रकबा भी बढ़ गया। या यूं कहें कि पश्चिम में जैसे-जैसे गन्ना मजबूत हुआ, भाजपा भी मजबूत होती गई। अब भुगतान समय से हो रहा है। छह साल में रिकॉर्ड ६८२ लाख टन से ज्यादा चीनी उत्पादन किया गया।

एथेनॉल का उत्पादन ४२ करोड़ लीटर से पहुंचा १७५ करोड़ लीटर

गन्ना चीनी के अलावा तमाम कीमती उत्पादों का जरिया है। शोध में पाया गया है कि गन्ने के ८२ फीसदी हिस्से से तमाम उत्पाद और केमिकल बन सकते हैं। इससे चीनी का हिस्सा केवल १८ फीसदी रह जाएगा। इस दिशा में प्रदेश सरकार ने उल्लेखनीय काम किए हैं। पिछले सात साल में एथेनॉल बनाने में सबसे ज्यादा प्रोत्साहन दिया गया। गन्ने से ब्यूटाइल एल्डिहाइड जैसे कीमती केमिकल उत्पाद बन सकते हैं। एथेनॉल को पेट्रोल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। प्रदेश में ८१ डिस्टिलरी हैं। ६४ एथेनॉल बनाती हैं। वर्ष २०१६-१७ में कुल एथेनॉल उत्पादन ४२.७० करोड़ लीटर था। जो आज १७५ करोड़ लीटर से ज्यादा हो गया है।

फर्जी लेनदेन हुआ बंद

२५ साल पहले पर्ची का काम सहकारी समितियों से लेकर चीनी मिलों को दिया गया। इसका जमकर दुरुपयोग हुआ। गन्ना माफिया पैदा हो गए। अब ये काम चीनी मिलों से लेकर पुन: सहकारी समितियों को दे दिया गया। इसका असर यह हुआ कि १४ लाख नए किसान सदस्य बने। इससे फर्जी लेनदेन बंद हो गए।

किसानों को हुआ ज्यादा भुगतान

प्रदेश में पहली बार विभागीय व चीनी मिल अफसरों के संयुक्त हस्ताक्षर से चीनी मिलों के एस्क्रो अकाउंट खुलवाए गए चीनी मिलों ने चीनी, खोई व प्रेसमड (गन्ना रस की मैल) बिक्री से प्राप्त रकम का ८५ फीसदी इसी एस्क्रो अकाउंट में जमा होगा। एस्क्रो अकाउंट से किसानों को भुगतान में देरी पर अंकुश के साथ कीमतें बेहतर हुईं २०१६-१७ में औसत गन्ना उत्पादकता ७२.३८ मी. टन थी। आज ८३.९५ मी. टन। किसानों को २५ फीसदी की अतिरिक्त आमदनी यहां के गन्ने से सबसे ज्यादा निकलती है चीनी, गन्ना मूल्य उसी अनुपात में बढ़े।

१९५४ में उत्तर प्रदेश शासन ने गन्ना क्रय अधिनियम पारित किया। इसमें प्रावधान किया गया कि मिल में गन्ना सप्लाई के १४ दिन के अंदर भुगतान कर दिया जाएगा। वरना १२ फीसदी ब्याज दिया जाएगा। भुगतान नहीं करने पर मिल के चीनी स्टॉक को जब्त कर लिया जाएगा। उसे बेचकर पैसा किसानों को देने का अधिकार राज्य सरकार को दिया गया। अगर ये रकम भी पर्याप्त न हो तो चीनी मिल की संपत्ति तक बेचने का प्रावधान किया गया। पूर्व कृषि मंत्री और पूर्व सदस्य, योजना आयोग सोमपाल शास्त्री के मुताबिक मैं १९९८ में लोकसभा पहुंचा और कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। संसद की खाद्य मंत्रालय की स्थायी समिति ने भी चीनी मिल लाइसेंस प्रणाली से मुक्त करने की सिफारिश की। वाजपेयी सरकार ने इसे लागू किया और चीनी उद्योग लाइसेंस से मुक्त हो गया। इसमें एक प्रावधान जोड़ दिया कि १५ किलोमीटर के दायरे में दूसरी मिल नहीं लग पाएगी। २५०० टन से ड़ी मिल होगी तो क्षेत्रफल दोगुना हो जाएगा।

छह साल में ऐसे बदला गन्ने का अर्थशास्त्र

पहले गन्ने के खेतों की नपाई और उत्पादन के अनुमान का काम मैनुअल था। २०१८ के बाद इसे पूरी तरह डिजिटाइज किया गया। कागजी खेल पर लगाम कसी। हैंडहेल्ड डिवाइस की मदद से हर खेत की डिजिटल नापजोख और अनुमानित उत्पादन का डाटा तैयार हो रहा है। पहले गन्ने की तौल चीनी मिलें करती थीं। अब किसानों को अपना गन्ना केवल केंद्र तक लाना होता है। वहां डिजिटल तौल के साथ मिल में गन्ना पहुंचाने की तारीख सब मोबाइल एप में मिल जाती है। इस वजह से पहले मिलों में गन्ना बेचने के लिए पर्ची की जो मारामारी रहती थी, वह अब खत्म हो गई है। फोन पर ई पर्ची दिखाकर नियत तारीख पर गन्ना बेचने किसान पहुंच जाते हैं। मिल पर पहुंचने के बाद अधिकांश मामलों में समय से भुगतान सीधे खाते में आता है। किस किसान के खाते में, कब, कितना भुगतान आया, इसका ब्योरा भी एप पर रहता है।

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