Friday, April 19, 2024
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देश के गन्ना किसानों को केंद्र का तोहफा, खरीद मूल्य में 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी; केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में फैसला

भारत के गन्ना किसानों को पहले ही दुनिया में सबसे ज्यादा कीमत दी जा रही है। फिर भी सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को सबसे सस्ती चीनी उपलब्ध करा रही है। सरकार के इस फैसले के बाद अब चीनी मिलें गन्ने की एफआरपी 10.25 प्रतिशत की रिकवरी पर 340 रुपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान करेंगी। प्रत्येक 0.1 प्रतिशत की अधिक रिकवरी पर किसानों को 3.32 रुपये की अतिरिक्त कीमत मिलेगी।

लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने किसानों के हित में बड़ा फैसला लेते हुए गन्ने के उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) में सत्र 2024-25 के लिए प्रति क्विंटल 25 रुपये की वृद्धि की है। पहले गन्ने का प्रति क्विंटल खरीद मूल्य 315 रुपये था। अब यह बढ़कर 340 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने बुधवार को यह निर्णय लिया।

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इसे गन्ने की ऐतिहासिक कीमत बताया और कहा कि सत्र 2023-24 के गन्ने की एफआरपी से यह लगभग आठ प्रतिशत और लागत से 107 प्रतिशत अधिक है। नया एफआरपी 10 फरवरी से प्रभावी होगा। इससे गन्ना किसानों की आमदनी में इजाफा होगा। केंद्र सरकार के इस फैसले से पांच करोड़ से अधिक गन्ना किसानों और चीनी क्षेत्र से जुड़े लाखों अन्य लोगों को फायदा होगा। यह फैसला किसानों की आय दोगुनी करने की मोदी की गारंटी को पूरा करने में भी सहायक होगा।

उल्लेखनीय है कि भारत के गन्ना किसानों को पहले से ही दुनिया में गन्ने की सबसे ज्यादा कीमत दी जा रही है। फिर भी सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को सबसे सस्ती चीनी उपलब्ध करा रही है। सरकार के इस फैसले के बाद अब चीनी मिलें गन्ने की एफआरपी 10.25 प्रतिशत की रिकवरी पर 340 रुपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान करेंगी। प्रत्येक 0.1 प्रतिशत की अधिक रिकवरी पर किसानों को 3.32 रुपये की अतिरिक्त कीमत मिलेगी, जबकि 0.1 प्रतिशत की कमी होने पर समान राशि की कटौती की जाएगी।

अनुराग ठाकुर ने बताया कि पिछले दस वर्षों में मोदी सरकार ने किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य उचित समय पर दिलाने का प्रयास किया है। पिछले सत्र यानी 2022-23 का 99.5 प्रतिशत गन्ना बकाये का भुगतान कर दिया गया है। सरकार के नीतिगत हस्तक्षेप के चलते चीनी मिलें भी आत्मनिर्भर हो गई हैं और अब उन्हें कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जा रही है।

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